भारत की आजादी की तारीख

मुख्य बिंदु

  • 15 अगस्त को आजादी की तारीख बनाने में लॉर्ड माउंटबेटन की महत्वपूर्ण भूमिका
  • द्वितीय विश्व युद्ध में जापान के आत्मसमर्पण की तारीख से प्रेरणा
  • भारत को इंडियन इंडिपेंडेंस एक्ट 1947 के जरिए आजादी मिली
  • प्रेस कॉन्फ्रेंस में तत्काल लिया गया यह ऐतिहासिक निर्णय

नई दिल्ली। भारत आज अपनी आजादी का 79वां सालगिरह मना रहा है। यह एक ऐसा दिन है जो अनगिनत बलिदानों, संघर्षों और सपनों की गाथा समेटे हुए है। 15 अगस्त 1947 को जब देश ने ब्रिटिश शासन से मुक्ति पाई, तो इस ऐतिहासिक क्षण के पीछे छुपी कहानी उतनी ही जटिल और दिलचस्प है जितना कि स्वयं स्वतंत्रता संग्राम की यात्रा।

लेकिन क्या आपको पता है कि 15 अगस्त की तारीख का चुनाव कैसे हुआ था? इस निर्णय के पीछे कौन सा व्यक्ति था और इसका जापान से क्या संबंध है? आइए जानते हैं उस ऐतिहासिक पल की अनकही कहानी, जिसने न केवल भारत बल्कि पूरे उपमहाद्वीप के भविष्य को नई दिशा दे दी।

आजादी के लिए कैसे तय हुआ 15 अगस्त?

प्रसिद्ध फ्रेंच लेखकों डॉमिनिक लापियरे और लैरी कॉलिंस ने अपनी चर्चित किताब ‘फ्रीडम एट मिडनाइट’ में भारत की स्वतंत्रता की तारीख निर्धारण के बारे में एक रोचक घटना का उल्लेख किया है। यह घटना न केवल इतिहास की दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह दिखाती है कि कभी-कभी इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण फैसले कितनी अचानक परिस्थितियों में लिए जाते हैं।

“कई महत्वपूर्ण बैठकों और विचार-विमर्श के बाद जब तत्कालीन गवर्नर जनरल लॉर्ड माउंटबेटन भारत की आजादी को लेकर प्रेस कॉन्फ्रेंस कर रहे थे, तब उनसे अचानक एक सवाल पूछा गया।”

प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान एक पत्रकार ने माउंटबेटन से पूछा कि क्या वे भारत की आजादी की तारीख तय कर चुके हैं। यह सवाल अप्रत्याशित था और गवर्नर जनरल माउंटबेटन इसके लिए तैयार नहीं थे। लेकिन एक अनुभवी प्रशासक होने के नाते, उन्होंने महसूस किया कि इस सवाल का तुरंत और स्पष्ट उत्तर देना आवश्यक है।

जापान कनेक्शन: द्वितीय विश्व युद्ध की यादें

उस महत्वपूर्ण क्षण में जब माउंटबेटन को तुरंत एक तारीख सोचनी पड़ी, तो उनके मन में एक विशेष दिन की याद आई – 15 अगस्त 1945। यह वह दिन था जब जापान ने द्वितीय विश्व युद्ध में आत्मसमर्पण किया था और माउंटबेटन को अपना आत्मसमर्पण सौंपा था।

लॉर्ड माउंटबेटन की भूमिका

द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान माउंटबेटन दक्षिण-पूर्व एशिया कमान के सर्वोच्च सहयोगी कमांडर थे। उन्होंने ही युद्ध के अंत में जापानी सेना के आत्मसमर्पण को स्वीकार किया था।

यह दिन माउंटबेटन के लिए व्यक्तिगत और व्यावसायिक गौरव का प्रतीक था। जब भी वे इस दिन को याद करते थे, उनका सीना गर्व से फूल जाता था। यह उनकी सैन्य करियर की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक थी। इसी भावनात्मक जुड़ाव के कारण उन्होंने तत्काल 15 अगस्त 1947 को भारत की स्वतंत्रता की तारीख घोषित कर दी।

इंडियन इंडिपेंडेंस एक्ट 1947: कानूनी आधार

गवर्नर जनरल लॉर्ड माउंटबेटन की घोषणा के बाद ब्रिटेन की संसद ने इस तारीख को औपचारिक मंजूरी देने के लिए ‘इंडियन इंडिपेंडेंस एक्ट 1947’ पारित किया। यह एक्ट न केवल भारत की स्वतंत्रता का कानूनी आधार बना, बल्कि इसने पूरे उपमहाद्वीप के भविष्य को आकार दिया।

एक्ट की मुख्य विशेषताएं

पारित तारीख: 18 जुलाई 1947
स्वीकृति: ब्रिटिश संसद के दोनों सदनों द्वारा
प्रभाव: भारत और पाकिस्तान का विभाजन

इस एक्ट के तहत 15 अगस्त 1947 को ब्रिटिश सरकार को भारत से अपना औपनिवेशिक शासन समाप्त करना था। ब्रिटिश संसद के हाउस ऑफ कॉमन्स और हाउस ऑफ लॉर्ड्स ने इस ऐतिहासिक कानून को पारित किया, जिसके परिणामस्वरूप भारतीय उपमहाद्वीप को दो डोमिनियन – भारत और पाकिस्तान में विभाजित किया गया।

डोमिनियन स्टेटस से संप्रभु राष्ट्र तक

डोमिनियन स्टेटस का अर्थ था कि भारत और पाकिस्तान को एक प्रकार की स्वायत्तता प्राप्त होगी, लेकिन वे अभी भी ब्रिटिश साम्राज्य का हिस्सा रहेंगे। हालांकि, इसी एक्ट में दोनों देशों को यह विकल्प भी दिया गया था कि वे चाहें तो डोमिनियन स्टेटस को त्यागकर पूर्ण संप्रभु राष्ट्र बन सकते हैं।

“भारत 15 अगस्त 1947 से लेकर 26 जनवरी 1950 तक ब्रिटेन का डोमिनियन बना रहा। इसके बाद भारतीय संविधान के लागू होने के साथ ही हमने पूर्ण गणतंत्र का दर्जा प्राप्त किया।”

26 जनवरी 1950 को जब भारतीय संविधान लागू हुआ, तो हमारे देश ने इंडियन इंडिपेंडेंस एक्ट की सभी शर्तों को खारिज कर दिया और एक पूर्ण संप्रभु लोकतांत्रिक गणराज्य बना। इसके विपरीत, पाकिस्तान 1956 तक ब्रिटेन का डोमिनियन बना रहा।

निष्कर्ष: इतिहास का एक अनमोल पल

आज जब हम 79वां स्वतंत्रता दिवस मना रहे हैं, तो यह जानना दिलचस्प है कि हमारी आजादी की तारीख का चुनाव कितना अप्रत्याशित था। एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में पूछे गए सहज सवाल और एक व्यक्ति की व्यक्तिगत यादों ने भारत के इतिहास की दिशा तय कर दी।

यह घटना हमें सिखाती है कि इतिहास कभी-कभी सबसे अप्रत्याशित क्षणों में बनता है। लॉर्ड माउंटबेटन का यह तत्काल निर्णय न केवल भारत के लिए बल्कि पूरे दक्षिण एशिया के लिए एक ऐतिहासिक मोड़ साबित हुआ। आज जब हम तिरंगा फहराते हैं और अपनी स्वतंत्रता का जश्न मनाते हैं, तो हमें उन सभी घटनाओं को याद रखना चाहिए जिन्होंने इस पवित्र दिन को हमारे लिए संभव बनाया।

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✍️ यह लेख News Ka Store की संपादकीय टीम द्वारा लिखा गया है। हमारा उद्देश्य आपको निष्पक्ष, सटीक और उपयोगी जानकारी देना है।

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