Nimisha Priya फांसी की सजा: यमन की जेल में बंद भारतीय नर्स निमिषा प्रिया की फांसी की सजा को रद्द करवाने के लिए चल रही अंतरराष्ट्रीय मुहिम अब अपने निर्णायक मोड़ पर पहुंच गई है। केरल की रहने वाली इस महिला को 2017 में एक यमनी नागरिक की हत्या के आरोप में मौत की सजा सुनाई गई थी। लेकिन पिछले छह वर्षों से भारत और विदेशों में फैले सैकड़ों लोगों का समूह उसकी रिहाई के लिए संघर्ष कर रहा है।
निमिषा प्रिया की मां प्रेमा कुमारी, जो कि एक घरेलू कामकाज करने वाली महिला हैं, ने अपनी इकलौती संपत्ति बेचकर बेटी के लिए वकीलों की फीस चुकाई। वह अब पिछले एक साल से यमन में हैं और वहां की जनजातीय परंपराओं के अनुसार माफीनामा (पार्डन) के लिए स्थानीय परिवार से बातचीत कर रही हैं। उन्होंने न केवल आर्थिक बल्कि मानसिक रूप से भी पूरे मिशन को अपनी मजबूत उपस्थिति से संबल दिया है। उनकी मौजूदगी ने स्थानीय जनजातीय समाज में भरोसे की भावना को भी मजबूत किया है, जो इस तरह की क्षमा याचना में निर्णायक भूमिका निभाती है।
इस मुहिम की शुरुआत 2018 में सैमुअल जेरोम भास्कर, एक गल्फ बेस्ड मानवाधिकार कार्यकर्ता, द्वारा हुई थी। उन्होंने भारत सरकार को मामले की जानकारी दी और मीडिया के माध्यम से इसे जनता के सामने लाया। इसके बाद दीपा जोसेफ, एक वकील और सामाजिक कार्यकर्ता, ने 2019 में इस मामले को व्यक्तिगत मिशन बना लिया।
2020 में उन्होंने यमन की जेल में बंद निमिषा से पहली बार सीधा संपर्क किया — जो एक भारतीय नागरिक के लिए बहुत बड़ी उपलब्धि थी। इसके बाद Save Nimisha Priya Action Council नामक संगठन की स्थापना हुई, जिसमें सांसदों, पूर्व मंत्रियों, एनजीओ और हजारों लोगों ने हिस्सा लिया।
यमन की जनजातीय न्याय व्यवस्था में दोषियों को माफ करने की एक खास परंपरा है, जिसे “दिया” कहा जाता है — यानी पीड़ित के परिजनों को खून के बदले धन (Blood Money) देने की प्रक्रिया। यदि पीड़ित परिवार इस रकम को स्वीकार कर ले, तो फांसी की सजा को माफ किया जा सकता है।
इस प्रक्रिया के तहत अब तक दो किश्तों में कुल $20,000 राशि वकीलों को दी जा चुकी है, जिससे पूर्व-समझौता (Pre-Negotiation Rituals) पूरे किए गए हैं। यह पैसा भारतीय विदेश मंत्रालय की अनुमति और भारतीय दूतावास की निगरानी में यमन में भेजा गया। इस रकम से यमन की जनजातियों के साथ पारंपरिक बैठकों, शांति समारोहों और वार्ताओं के पहले चरण को पूरा किया गया।
जनवरी 2025 में, मानवतावादी कार्यकर्ता सैमुअल भास्कर ने $1 मिलियन (लगभग 8.3 करोड़ रुपये) की बड़ी राशि दिया (Diyah) के रूप में पीड़ित परिवार को देने की पेशकश की है। यह राशि यमन के कबीलाई न्याय तंत्र के अंतिम चरण में दी जाती है, जिससे दोषी को माफ़ी मिलने की कानूनी संभावना बनती है। हालांकि, अब तक पीड़ित परिवार ने यह पेशकश स्वीकार नहीं की है, जिससे अंतिम माफीनामा लंबित है। यह एक संवेदनशील प्रक्रिया है जिसमें कई बार भावनात्मक और सांस्कृतिक बाधाएं भी आ जाती हैं।
इस अभियान को केवल कुछ व्यक्तियों ने नहीं, बल्कि भारत सरकार, राजनीतिक प्रतिनिधियों, और सामाजिक संगठनों का भी भरपूर सहयोग मिला है।
विदेश मंत्रालय, पूर्व विदेश राज्यमंत्री जनरल वी. के. सिंह, विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर, राज्यसभा सांसद डॉ. शशि थरूर, जॉन ब्रिटास, डीन कुरियाकोस, चांडी ऊम्मेन, और राम्या हरिदास जैसे कई सांसदों ने इस मिशन में सक्रिय भागीदारी निभाई है।
इसके अलावा, Marunadan Malayali जैसे मीडिया प्लेटफॉर्म और कई एनजीओ, खासतौर से Save Nimisha Priya Action Council, ने कानूनी, कूटनीतिक और मानवीय स्तर पर अथक प्रयास किए हैं। इस परिषद के संयोजक जयन इडापल, संरक्षक बाबू जॉन, मूसा मास्टर, और टीम के अन्य सदस्य — ओ वी मुस्तफा, आजाद तिरूर, के वी शम्सुद्दीन, सजीव कुमार, रफीक रवुथर — भी इस अभियान की रीढ़ रहे हैं।
इस पूरे अभियान की नेतृत्वकर्ता दीपा जोसेफ कहती हैं:
“मैं न तो कानून के खिलाफ हूं और न ही पीड़ित के परिवार के। लेकिन एक महिला, जो एक मां है, एक बेटी है – उसे एक और मौका मिलना चाहिए।”
उनका यह कथन इंटरनेट पर वायरल हो चुका है:
“जब कोई मां कहती है: मेरी बेटी को वापस दो, मैं चुप नहीं रह सकती।”
निमिषा प्रिया का मामला अब एक कानूनी से अधिक मानवता का सवाल बन गया है। यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि आने वाले दिनों में क्या यमन की न्याय प्रणाली माफीनामे को स्वीकार कर भारत की इस बेटी को घर लौटने का अवसर देगी।
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